राशिफल

समझ की शुरुआत ही है अज्ञान से लड़ने का तरीका, अज्ञान से बचना भी उस पर विजय पाने जैसा

संसार में संपूर्ण अज्ञान नाम की चीज नहीं होती। अज्ञान अक्सर परिस्थितियों के हिसाब से बदलता रहता है। इसकी कोई एक सर्वमान्य परिभाषा भी नहीं हो सकती, पर इतना तो तय है कि जिस वक्त यह व्यक्ति के दिमाग पर हावी होता है, उस वक्त उसे यही लगता है कि वह संसार का सबसे बड़ा ज्ञानी है और उसके पास हर एक चीज के व्यापक मान्यता वाले तर्क हैं। जबकि उस वक्त ज्ञान तो दूर, उसकी छाया भी उसके पास नहीं होती। समझ की शुरुआत से ही इंसान अज्ञान से लड़ता आया है, अभी तक उसका यह युद्ध जारी है, लेकिन अभी तक इंसान अज्ञान से जीत नहीं पाया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम अज्ञान से कभी जीत पाएंगे?

हमने गणित का आविष्कार किया, फिजिक्स को पहचाना और केमिस्ट्री के सारे गुणसूत्र बनाए। हमने अपने ज्ञान का लगातार विस्तार किया, इंटरनेट बनाया, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस बनाई और अब डीएनए और दूसरे डेटा से लगातार अपनी प्रजाति और समूचे ब्रह्मांड को समझते जा रहे हैं। हमने युद्ध किए और बेरहम शासकों को हटाकर उनसे थोड़ा कम बेरहम शासकों को लाने में कामयाबी पाई। हमने हर वह कोशिश की कि जिससे हम अज्ञान पर विजय पा सकें, लेकिन ऐसा कैसे हो रहा है कि बावजूद इन सबके हम अभी तक अज्ञान को जीतने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं? जबकि हम अच्छे से जानते हैं कि अज्ञान जैविक चीज नहीं है, यह हमारे गुणसूत्रों में कहीं नहीं पाया जाता। इसका मैदान परिस्थितियों या समय की सेज पर ही हरा भरा होता है, जिसमें खाद-पानी हमारे अज्ञानतापूर्ण निर्णय देते हैं।

अज्ञान जड़ होता है। दिमाग में जब उगता है तो उसे हिला पाना संसार के सबसे ज्ञानी के लिए भी असंभव होता है। हम हीरे को गला सकते हैं और सोने की भी भस्म बना सकते हैं। लेकिन ऐसा कोई ज्ञान या कोई यंत्र नहीं बना है, जिससे हम किसी जड़मति को हिला सकते हैं। एक अज्ञानी के आगे लाख ज्ञानी भी बौने होते हैं। भर्तृहरि कहते हैं कि मनुष्य प्रयत्नपूर्वक पेरने पर बालू से भी तेल निकाल सकता है। प्यास से व्याकुल इंसान रेगिस्तान में भी पानी खोज लेता है। घूमते-फिरते शायद कभी खरगोश के सिर पर सींग भी पा सकता है, लेकिन कोई भी किसी हठी, अज्ञानी आदमी के चित्त को मना नहीं सकता है।

जब हम युद्ध नहीं जीत सकते तो दो बातें होती हैं। या तो हम वीरगति को प्राप्त हो जाएं, या फिर युद्ध का मैदान छोड़ दें। सैनिक लड़ने के लिए होते हैं, मरने के लिए नहीं। युद्ध में मरना भले किसी को बहादुरी लगे, लेकिन यह भी एक तरह का अज्ञान ही है। योद्धा जानते हैं कि कब उन्हें एक कदम पीछे लेना है और कब दो कदम आगे चलना है। दुश्मन मजबूत हो तो दो कदम पीछे आकर दूसरे तरीकों से उस पर हमला किया जाता है, ताकि उस पर विजय मिले। अज्ञान जब पूरी तरह से जड़ हो तो उससे दूरी बरतने में ही भलाई है। हमें इंतजार करना होगा कि कब उसकी जड़ ढीली पड़े और तभी हमें उस पर हमला करना होगा। जब लगे कि किसी काम को करने में हमसे कुछ अज्ञानता हो सकती है तो तुरंत उसे वहीं पर छोड़कर कुछ दूसरा काम करना होगा। अज्ञान से बचना भी उस पर विजय पाने जैसा ही होता है।

Source : indiatimes.com

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