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Kumbh Mela 2019: क्या है शाही स्नान, जानें कैसे हुई इसकी शुरुआत

दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन कुंभ में शुरू हो चुका है। कुंभ मेले की शुरुआत शाही स्नान से होती है। कुंभ का यह सबसे बड़ा आकर्षण होगा, जिसमें अखाड़ों के आचार्य महामंडलेश्वर, महंत और नागा साधु संत शाही स्नान करते हैं और इस दुर्लभ स्नान को अमृत स्नान मानते हैं। इसके लिए पहले पूरे विधि-विधान से वह हर प्रकिया का पालन करते हैं। कुंभ मेले के दौरान अखाड़ों के शाही स्नान का वक्त तय कर दिया गया है। उनसे पहले कोई भी स्नान के लिए नदी में नहीं उतर सकता है। आइए जानते हैं क्या है शाही स्नान और किस तरह हुई इसकी शुरुआत…

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शास्त्रों में नहीं मिलता शाही स्नान का जिक्र

शास्त्रों और पुराणों में शाही स्नान को लेकर निकाली जाने वाली पेशवाई का कोई जिक्र नहीं है लेकिन यह परंपरा सदियों पुरानी है। माना जाता है कि शाही स्नान की शुरुआत 14वीं से 16वीं सदी के बीच हुई थी। तभी मुगल शासक भारत में अपनी जड़ें जमाने लग गए। दोनों का धर्म अलग-अलग होने की वजह से साधु इन शासकों को लेकर उग्र और उनसे सीधे तौर पर संघर्ष करने लग गए थे।

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हुआ था काम का बंटवारा

जब साधु और शासकों के बीच संघर्ष बढ़ने लगा तो इसके लिए एक बैठक हुई। जिसमें दोनों एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करेंगे और धर्म के काम में कुछ नहीं कहेंगे। इस बैठक में काम और झंडे का भी बंटवारा किया गया।

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इस तरह निकाली गई पेशवाई

साधुओं को सम्मान देने के लिए कुंभ के दौरान खास महसूस कराने के लिए हाथी, घोड़ों पर बैठकर उनकी पेशवाई निकाली गई। स्नान के दौरान साधुओं का ठाठ-बाट राजाओं जैसा होता था इस वजह से उनके स्नान को शाही स्नान कहा गया। तभी से शाही स्नान की प्रकिया चल रही है।

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खूनी संघर्ष का दौर हो चुका था शुरू

शाही स्नान को लेकर अखाड़ों के बीच संघर्ष का दौर शुरू हो गया था। पहले शाही स्नान को लेकर नदी का पानी तक खून से लाल हो चुका था। इसके बाद ब्रिटिश साम्राज्य ने अखाड़ों के शाही स्नान को लेकर एक क्रम और समय तय किया। इसके बाद से यही नियम आज तक लागू हो रहा है। आज भी उसी क्रम में अखाड़े शाही स्नान करते हैं।

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इस करते हैं शाही स्नान

अखाड़े के साधु-संत कुंभ में शाही स्नान के लिए सोने-चांदी की पालिकयों पर बैठकर पेशवाई निकालते हैं। इसके बाद अंग्रेजों द्वारा बनाए गए क्रम और शुभ मुहूर्त में त्रिवेणी के तट पर पहुंचते हैं और जोर-जोर से जयकारे लगाते हैं। माना जाता है शुभ शुभ मुहूर्त में गंगा में स्नान करने से जल अमृत बन जाता है, जिससे अमरता प्राप्त होती है। साधु-संत के बाद आम जनता त्रिवेणी में स्नान करने पहुंचती है।

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Source : indiatimes.com

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