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Kumbh 2019: कैसा होता है नागा साधुओं का जीवन, जानिए खुद इन्‍हीं की जुबानी

प्रयागराज

अखंड भारत को खंडित करने के साथ धन-सम्पदा को नष्ट करने के लिए जब विदेशी आक्रमणकारी भारत भूमि पर आने लगे तो आदि शंकराचार्य ने अखाड़ों की स्थापना की। उनका मानना था कि आक्रमणकारियों से निपटने के लिए पूजा-पाठ के साथ शारीरिक श्रम व अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा भी साधुओं को मिलनी चाहिए। इसी मकसद से आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में 7 अखाड़ों की खुद स्थापना की। आदि शंकराचार्य ने खुद महानिर्वाणी, निरंजनी, जूना, अटल, आवाहन, अग्नि और आनंद अखाड़े की स्थापना की। अब अखाड़ों की संख्या 13 हो गई है। तो आइए एक नजर डालते हैं कैसा होता है नागाओं का जीवन-

बस्ती के बाहर होता है निवास

अखाड़ों का एक नियम यह है कि नागा साधुओं को बस्ती के बाहर ही निवास स्थान खोजना होगा। संन्यासी के अलावा वह न किसी को प्रणाम करेगा न ही किसी की निंदा करेगा। दीक्षा लेने वाले हर नागा साधु को इसका पालन करना पड़ता हैं।

नागा साधु और अघोरी में इतना अंतर रह जाएंगे हैरान

पिंडदान-श्राद्ध करने के बाद मिलता है नया नाम

संगमनगरी में लगे कुंभ में इन अखाड़ों की अजब-गजब दुनिया देश-दुनिया के श्रद्धालुओं के लिए किसी कौतूहल से कम नहीं है। इन अखाड़ों में जूना अखाड़े का जलवा सबसे ज्यादा है। जूना अखाड़े के नागा साधु युद्ध कला में माहिर रहते हैं। जूना अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री महंतपरशुराम गिरी ने एनबीटी से खास बातचीत में नागा साधु बनने की प्रकिया से लेकर ढेरों जानकारी दी। उनका कहना है कि किसी को नागा साधु की दीक्षा लेने से पूर्व खुद का पिंड दान और श्राद्ध तर्पण करना पड़ता है। पिंडदान व श्राद्ध के बाद गुरु जो नया नाम और पहचान देता है, उसी नाम से जाना जाता है। नागा साधु की दीक्षा देने से पहले उसके स्वयं पर नियंत्रण की स्थिति को परखा जाता है। तीन साल तक दैहिक ब्रह्मचर्य के साथ मानसिक नियंत्रण को परखने के बाद ही नागा साधु की दीक्षा दी जाती है।

हिंदू धर्म का व्यक्ति ही बन सकता है नागा साधु

जूना अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री महंत परशुराम गिरी ने बताया कि हिंदू धर्म के किसी भी जाति का कोई व्यक्ति नागा साधु बनने की प्रक्रिया व परीक्षा पास करने के बाद नागा साधु बन सकता है। उन्होंने कहा, दूसरे धर्म का कोई भी व्यक्ति नागा साधु नहीं बन सकता है।

ऐसे होते हैं खूनी नागा, इन्हें होता है अधिकार

जमीन पर सोना और भिक्षा मांगकर खाना

नागाओं को एक दिन में एक ही समय भोजन करना होता है। वो भोजन भी भिक्षा मांग कर लिया गया होता है। एक नागा साधु को सात घरों से भिक्षा लेने का अधिकार है। अगर सातों घरों से भिक्षा ना मिले, तो भूखे रहना पड़ता है। वहीं केवल धरती पर ही सोना होता है।

भस्म व रुद्राक्ष ही करते हैं धारण

नागा साधु की दीक्षा के दौरान साधक को वस्त्र त्याग करने के साथ चोटी का भी त्याग करना होता है। वस्त्र के नाम पर भस्म व रुद्राक्ष धारण करने की अनुमति होती है। वस्त्र अगर धारण करना होता है तो सिर्फ गेरुए रंग का एक वस्त्र ही धारण किया जा सकता है।

Source : indiatimes.com

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