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पौष पूर्णिमा 2019: यह काम करने से मिलता है स्वर्ग में स्थान, जानें महत्व

ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय
ज्योतिष शोध संस्थान के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय के अनुसार, पौष पूर्णिमा पर ग्रह पिण्ड चंद्रमा, ग्रह नक्षत्रों की विशेष स्थिति और सुयोग पर अपनी प्राणदायिनी अमृतमयी किरणों का संचरण कर जल में प्राणदायी उर्जा समाहित करेगा। ग्रह नक्षत्रों की गणना अनुसार, पौष पूर्णिमा के दिन पुष्य नक्षत्र देर रात तक रहेगा। मन, मस्तिष्क एवं जल तत्व को प्रभावित करने वाला चंद्रमा स्वयं की कर्क राशि में पूर्णिमा के दिन होना अत्यंत प्रभावशाली है।

ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय के अनुसार, कर्क राशि के चंद्रमा से युक्त पूर्णिमा एवं पुष्य नक्षत्र का संयोग, मकर के सूर्य, बुध, वृश्चिक के बृहस्पति, मीन के मंगल के साथ स्नान-दान के पुण्य प्रताप को कई गुना बड़ा रहा है। पौष पूर्णिमा पर्व का विशेष महत्व शास्त्रों में वर्णित है, इस दिन से माघ मास के पवित्र स्नान का शुभारंभ होता है। कुंभ में दूर-दराज से आए हुए अधिकांश श्रद्धालु माघ मास में पौष पूर्णिमा से संगम तट पर निवास कर एक महीने का कल्पवास व्रत प्रारम्भ करते हैं तथा कुछ मकर संक्रांति से अगली संक्रांति तक व्रत का संकल्प लेते हैं।

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स्नान-दान का है विशेष महत्व
धर्म शास्त्रों में पौष माह की पूर्णिमा को स्नान-दान का विशेष महत्व वर्णित है, जो व्यक्ति पूरे माघ मास के लिए स्नान का व्रत धारण करते हैं, वो अपने स्नान का प्रारम्भ पौष पूर्णिमा से शुरू कर माघी पूर्णिमा को समापन करते हैं। इस दिन स्नान के पश्चात् मधुसूदन भगवान की पूजा-आराधना कर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न किया जाता है, जिससे मधुसूदन की कृपा से मृत्योपरांत भक्त को स्वर्ग में स्थान मिल सके, ऐसी धार्मिक मान्यताएं हैं।

सत्यनारायण भगवान की कथा करें
इस दिन सूर्योदय के पूर्व स्नानादि करके भगवान मधुसूदन की एवं उनके पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन एवं आराधना यथा शक्तिदान देने का विधान है। सायंकाल सत्यनारायण भगवान की कथा भी होती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, जो इस स्नान को करता है, वह देव-विमान में बैठकर विहार करने के योग्य हो जाता है। इस स्नान का पुण्य अर्जित करने वाले पुण्यात्मा स्वर्ग में विहार करते हैं, ऐसी हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताएं हैं।

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एक मास स्नान करें
संगम के पवित्र जल में प्राणदायिनी शक्ति विद्यमान है, पौष पूर्णिमा के सुअवसर पर ग्रह-नक्षत्रों की विशेष स्थिति, चंद्र आदि ग्रहों के माध्यम से अमृत वर्षाकर स्नान आदि करने वालों को निरोगी काया सहित पुण्य लाभ प्रदान करती है। सौ हजार गायों का दान करने का जो फल होता है वही फल तीर्थराज प्रयाग में माघ मास में तीस दिन (एक मास) स्नान करने का होता है। माघ स्नान के लिए तीर्थराज प्रयाग को सर्वोत्तम माना गया है, लेकिन यदि कोई श्रद्धालु वहां न जा सके, तो वह जहां कहीं भी स्नान करे, वहां प्रयागराज सहित मां गंगा, यमुना, सरस्वती, त्रिवेणी संगम का स्मरण कर ले।

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इस दिन जरूर करें दान
सिविल लाइंस एनपीए आर्केड स्थित ग्रह नक्षत्र ज्योतिष शोध संस्थान की गुंजन वार्ष्णेय के अनुसार, पौष पूर्णिमा से प्रारम्भ कर माघ में स्नान के साथ दान का विशेष महत्व है। मनोवांछित फल की कामना रखने वालों को अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य अनुसार दान अवश्य करना चाहिए। जाड़ा होने के कारण कंबल आदि उनी वस्त्रों का दान इस समय विशेष महत्वपूर्ण माना गया है। जो लोग पूरे महीने दान न कर पाएं वे कम से कम पूर्णिमा एवं अमावस्या के दिन ही दान करके अपना लोक-परलोक संवार सकते हैं। माघ मास में स्नान, दान, उपवास व भगवान माधव की पूजा अत्यंत फलदायी बताई गई है। इस विषय में महाभारत के अनुशासन पर्व में इस प्रकार वर्णन है-

दशतीर्थसहस्त्राणि तिस्त्रः कोट्यस्तथा पराः। समागच्छन्ति माघ्यां तु प्रयागे भरतर्षभ।।
माघमासं प्रयागे तु नियतः संशितव्रतः। स्नात्वा तु भरतश्रेष्ठ निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात्।

अर्थात् माघ मास में प्रयागराज में तीन करोड़ दस हजार अन्य तीर्थों का समागम होता है, अतः जो नियमपूर्वक उत्तम व्रत का पालन करते हुए माघमास में प्रयाग में स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाता है। पूर्णिमा चंद्रमा की प्रिय तिथि है, यह तिथि सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली है। जो पूर्णिमा को चंद्रमा का पूजन करते हैं, वे धन-धान्य से युक्त होते हैं।

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उपाय
कर्क राशि का चंद्रमा तथा पूर्णिमा को पुष्य नक्षत्र का संचरण होने से इस दिन जिनके उपर चंद्रमा की महादशा चल रही हो अथवा जिन्हें मानसिक उलझनें अधिक रहती हों, वे नौ रत्ती का मोती दाहिने हाथ की सबसे छोटी उंगली में चांदी की अंगूठी में जड़वाकर प्राण-प्रतिष्ठा करवाकर अवश्य धारण करें। विशेष लाभ के लिए हाथ की अपेक्षा गले में अर्द्धचन्द्राकार रूपी लॉकेट में मोती जड़वाकर धारण करें। व्रती को इस दिन प्रातःकाल नदी आदि में स्नान करके देवताओं का पूजन एवं पितृों का तपृण करना चाहिए। सफेद चंदन, चावल, सफेद फूल, धूप-दीप, सफेद वस्त्र आदि से चंद्रमा का पूजन करें।

Source : indiatimes.com

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