राशिफल

जिंदगी की सबसे बड़ी चीज है अपने दिमाग को जवान रखना

निर्मल जैन

उम्र पाना एक पहलू है और उस उम्र को जीना दूसरा पहलू है। उम्र बढ़ रही होती है, पर जिंदगी घट रही होती है। उम्र तब तक बढ़ती रहेगी जब तक जीवन की डोर है, किंतु उस उम्र को जीना अपनी समझ, अपनी दृष्टि और अपने विवेक पर निर्भर करता है। जब तक जीवन समझपूर्वक नहीं जिएंगे तब तक यही कहा जाएगा कि सौ वर्ष की उम्र तो पाई, परंतु सौ वर्ष का जीवन भी जिया यह कहना मुश्किल है। जीवन, विकसित या वृद्ध होने की प्रक्रिया हो सकता है। विकसित होना वर्षों में जीवन को जोड़ना है और वृद्ध होना जीवन में वर्षों को जोड़ना है।

आजकल ‘लर्निंग’ और ‘अर्निंग’ के पीछे हम भागते हैं, पर ‘लिविंग’ भूल गए हैं। मूल बात उम्र नहीं है। मायने रखता है जीवन का जीना। कौन कितनी सुगमता, बुद्धिमत्ता से जीता है उसका महत्व है। सिर्फ सांस लेना ही जीवन नहीं, सांस को सुगंधित करके जीना जीवन है।

रवींद्रनाथ ठाकुर ने कहा है कि जीने के लिए भोजन जरूरी है, भोजन से भी ज्यादा पानी जरूरी है, पानी से भी ज्यादा वायु जरूरी है और वायु से भी ज्यादा जरूरी है जितनी आयु मिली है उसे जीवंतता पूर्वक जीना। मगर मरने के लिए कुछ भी जरूरी नहीं है। मरने के लिए अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता है। आजकल के आपाधापी भरे जीवन में कभी भी दिमाग की नस फटने, दिल की धड़कन रुकने मात्र से आदमी की मृत्यु हो जाती है। लेकिन वास्तविक रूप से उसकी मृत्यु तो तभी हो जाती है जिस दिन उसके अंदर से जीने का उत्साह, ललक और उम्मीदें मर जाती हैं।

जो सीखना छोड़ देता है वह बूढ़ा है, चाहे बीस का हो या अस्सी का। जो सीखता रहता है वह जवान रहता है। जिंदगी की सबसे बड़ी चीज है अपने दिमाग को जवान रखना। कोई उम्र का बढ़ना नहीं रोक सकता, पर अपनी उत्पादकता बढ़ाते हुए उम्रदराज होना कुछ और ही है।

हम अपनी नासमझी के कारण रोज-रोज मरते हैं। कभी हताशा से तो कभी मूर्छा से। कभी हमें अहंकार मार देता है तो कभी हम कुंठा के हाथों मृत्यु का शिकार बन जाते हैं। सच है कि आजकल की समस्याओं के बीच जिंदगी जीना विमान से बिना पैराशूट कूदने जैसा साहस भरा काम है। लेकिन जिसे जीना आता हो उसे कोई मार नहीं सकता। जब हमें जीवन के मूल्य का बोध हो जाता है तभी से हम जिंदगी के हर पल की इज्जत करने लगते हैं, चाहे वह सुखद हो या दुखों से भरा ही क्यों न हो। जीवन, मृत्यु के पड़ाव तक पहुंचे, उससे पहले हमारा प्रयास होना चाहिए कि चाहे हम कम जिएं लेकिन हमेशा एक प्रकाश स्तंभ बन कर जिएं।

दुखों का ज्वालामुखी हो या सुनामी की लहरें, अपने जीवन को कभी टूटने नहीं देना है। यूं भी जीवन के आखिरी क्षणों में अपनी जीवन भर की कमाई परिवार को सौंप कर, शरीर श्मशान को अर्पित कर हम सभी को इस दुनिया से विदा होना ही है। अगर इसी वास्तविकता को निरंतर अपने सामने रखें तब शायद जीने का असली सुख भोग लें। न शरीर में रोग-व्याधि उत्पन्न हो, न ही मन में पाप वृत्ति उपजे और न ही कभी संपत्ति का दुरुपयोग हो।

Source : indiatimes.com

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