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दुर्योधन नहीं दे पाया लेकिन अर्जुन ने दी ऐसी गुरु दक्षिणा

महाभारत का महायुद्ध मात्र एक कथा नहीं है बल्कि रहस्यों का भंडार है। युद्ध के अलावा पांडवों ने कौरवों को कई बार हराया था। उन्हीं में से एक कथा है गुरु द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा देने की। महापराक्रमी अश्वत्थामा गुरु द्रोण का पुत्र था। गुरु द्रोणाचार्य ने ही कौरवों व पांडवों को धर्मशास्त्रों के साथ अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा दी थी। शिक्षा के बाद गुरु द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा मांगी, जिसे दुर्योधन ने नहीं अर्जुन ने पूरा किया। आइए जानते हैं कि गुरु द्रोणाचार्य गुरु दक्षिणा में ऐसा क्या मांगा था….

यह थी गुरु दक्षिणा

कौरव व पांडव की शिक्षा पूरी होने पर गुरु द्रोणाचार्य ने कहा कि तुम पांचाल देश के राजा द्रुपद को बंदी बनाकर मेरे पास लाओ। राजा द्रुपद को बंदी बनाकर लाना ही मेरी गुरु दक्षिणा है। राजा द्रुपद ने एकबार गुरु द्रोणाचार्य का अपमान किया था।

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सब पहले दुर्योधन ने किया आक्रमण

अपमान का बदला लेने के लिए गुरु द्रोण ने प्रतिज्ञा ली थी। उस प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए गुरु द्रोण ने कौरव और पांडवों को भेजा था। गुरु द्रोण की बात सुनकर सबसे पहले दुर्योधन ने आज्ञा लेकर राजा द्रुपद पर आक्रमण कर उसे बंदी बनाने का प्रयास किया, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए।

अर्जुन ने दिखाया पराक्रम

इसके बाद बाद में पांडव राजा द्रुपद से युद्ध करने के लिए जा पहुंचे। अर्जुन के पराक्रम से राजा द्रुपद की सभी योजनाओं पर पानी फेर दिया और बंदी बनाकर गुरु द्रोणाचार्य के पास लेकर आ गए।

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गुरु द्रोण ने कर दिया द्रुपद को माफ

द्रुपद को देखकर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैंने बल पूर्वक तुम्हारे राष्ट्र को रौद डाला है। तुम्हारी राजधानी को मिट्टी में मिला दिया है। बोलो अब पुरानी मित्रता चाहते हो क्या? इसके बाद गुरु द्रोण ने कहा कि तुम डरो मत, हम क्षमाशील ब्राह्मण हैं। हम तुमको माफ करते हैं।

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गुरु द्रोण ने दे दिया आधा राज्य

गुरु द्रोण ने इसके बाद द्रुपद को आधा राज्य लौटा दिया और आधा अपने पास रख लिया। इसके बाद राजा द्रुपद और गुरु द्रोण एक समान हो गए। इस तरह द्रोणाचार्य ने द्रुपद को हराकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। राजा द्रुपद ने इस अपमान का बदला लेने के लिए ऐसे यज्ञ किया था। यज्ञ से राजकुमारी द्रौपदी व राजकुमार धृष्टद्युम्न प्रकट हुए।

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राजा द्रुपद ने किया था अपमान

गुरु द्रोणचार्य और राजा द्रुपद बचपन के मित्र थे। वह दोनों भारद्वाज आश्रम में शिक्षा ग्रहण करते थे। बड़ा होकर द्रुपद राजा हो गया और द्रोणाचार्य ऋषि बन गए। एक बार द्रोणाचार्य द्रुपद के महल गए तो राजा ने उनका काफी अपमान किया। द्रुपद ने कहा कि राजा और गरीब कभी दोस्त नहीं हो सकते। द्रुपद के अपमान का बदला लेने की द्रोणचार्य ने प्रतिज्ञा ली थी, जिसें गुरु दक्षिणा के रूप में अर्जुन ने पूरा किया था।

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Source : indiatimes.com

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